खौफ के पंजों में पौड़ी: वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ रही, आंकड़े चिंताजनक, तीन साल में 246 मामले

गढ़वाल वन प्रभाग में वन्यजीवों के हमले में मौत और घायलों की संख्या बढ़ती गई है। सरकारी सिस्टम के रवैये से हालात बेकाबू हो रहे हैं।

राज्य में वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं लगातार हो रही हैं। इसमें गढ़वाल वन प्रभाग भी शामिल है। पिछले वर्ष इस प्रभाग में प्रदेश में सबसे अधिक मानव- वन्यजीव संघर्ष के मामले रिपोर्ट हुए हैं। यहां पर लगातार तीन वर्षों में वन्यजीवों के हमलों में लोगों की मौत और घायल होने के मामले बढ़े हैं।

बच्चों की सुरक्षा की दृष्टिगत स्कूलों को अस्थाई तौर पर बंद तक करना पड़ा है। हालत यह है कि वन्यजीवों की संख्या बढ़ने पर तारीफ बटोरने वाला तंत्र प्रभागों का पुनर्गठन करने के साथ संसाधन नहीं बढ़ा सका है, बल्कि जिस वन प्रभाग में सबसे अधिक घटनाएं हो रही हैं, वहां पर दशकों से जो स्वीकृत पद हैं? उसके सापेक्ष वन रक्षक, वन दरोगा से लेकर रेंजर तक तक के पद खाली चल रहे हैं।

इस प्रभाग में एक भी ट्रांजिट या रेस्क्यू सेंटर तक नहीं बन सका है। यह तब है, जब गढ़वाल मंडल के सबसे बड़े अधिकारी मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल का कार्यालय पौड़ी में है। वन संरक्षक का कार्यालय भी पौड़ी में स्थित है। गढ़वाल वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाले पौड़ी जिले में मानव- वन्यजीव संघर्ष पर विजेंद्र श्रीवास्तव की रिपोर्ट। 

आंकड़े चिंताजनक, तीन साल में 246 घटनाएं

गढ़वाल वन प्रभाग के मानव- वन्यजीव संघर्ष के चिंताजनक हालात की तस्दीक वन महकमे के आंकड़े भी कर रहे हैं। 2023 से 2025 तक गढ़वाल वन प्रभाग में वन्यजीवों के हमले की 246 घटनाएं हुई हैं। इसमें 14 लोगों की असमय मृत्यु और 232 घायल हुए हैं। इसमें वन्यजीवों के फसल, पशु और भवन क्षति के मामले अलग हैं। वर्ष 2025 में राज्य में सबसे अधिक वन्यजीवों के हमले के मामले (116) गढ़वाल वन प्रभाग में सामने आए थे। इस वर्ष जनवरी-2026 से 15 मार्च तक भी 16 घटनाएं हुई हैं।

वन्यजीवों के हमले की घटनाएं

वर्ष-मृत्य- घायल

2023-04-40

2024-05-81

2025-05-111

घटनाएं बढ़ रही, पर स्वीकृत पद के सापेक्ष भी नहीं पूरे कर्मचारी

राज्य बनने के बाद आवश्यकता अनुसार पुलिस विभाग में नए थाने, चौकी खोले गए और संसाधनों को बढ़ाया गया। इसी तरह परिवहन विभाग में नए चेकिंग के लिए आरटीओ के पद स्वीकृत करने के साथ नए एआरटीओ कार्यालय खोले गए। पर राज्य में 70 प्रतिशत से अधिक वन भूमि है और जहां पर वन्यजीवों की संख्या बढ़ने के साथ मानव- वन्यजीव संघर्ष के मामले बढ़े हैं, वहां पर प्रभागों का पुनगर्ठन तक नहीं हुआ है। करीब तीन साल से मामले को लेकर केवल कागजी कार्रवाई ही चल रही है। वहीं, जिस गढ़वाल वन प्रभाग में सबसे अधिक घटना हो रही है, वहां पर जो भी स्वीकृत पद हैं, उसके सापेक्ष भी रेंजर से लेकर वन आरक्षी तक वन कर्मियों की संख्या कम है।इसके अलावा गढ़वाल वन प्रभाग में वन्यजीवों की संख्या कितनी है? जंगल की कितनी धारण क्षमता है? वास स्थल की स्थिति कैसी है, उसको जानने को लेकर भी कोई वैज्ञानिक अध्ययन तक नहीं हुआ है।

प्रभाग में स्टाफ की स्थिति

पद- स्वीकृत पद- रिक्त पद

रेंजर-06-01

डिप्टीरेंजर-12-08

वन दरोगा-54-15

वन आरक्षी-89-20

एक भी रेस्क्यू सेंटर नहीं

इंसानी जिंदगी के लिए खतरा बने वन्यजीवों को पकड़ने का अभियान चलता है। पर इनको रखने के लिए पूरे गढ़वाल में कोई भी रेस्क्यू या ट्रांजिट सेंटर तक नहीं है। अभी गढ़वाल वन प्रभाग में योजना का खाका खींचा जा रहा है। इस प्रभाग में रेस्क्यू आपरेशन के लिए चलाने के लिए कोई स्थायी तौर पर पशु चिकित्सक भी तैनात नहीं है।

पूरे वन प्रभाग में केवल 12 बंदूक

वन प्रभाग में 12 बंदूक है। इसके अलावा पांच ट्रैंक्यूलाइजर गन है। इसके अलावा एक त्वरित प्रतिक्रिया बल है। सबसे अधिक तेंदुए को पकड़ने के 27 पिंजरे हैं। बाघ के चार और भालू के दो पिंजरे हैं। फील्ड टीम को छह वाहन उपलब्ध कराएं गए हैं।

सूचना दर्ज करते, बजट भी देते पर उपयोग को लेकर सवाल?

आपदा प्रबंधन विभाग जो बुलेटिन जारी करता है, उसमें वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को भी शामिल किया जाता है। इसके अलावा वन विभाग को उपकरण खरीदने और संसाधनों को बढ़ाने में राशि भी दी। पर आपदा प्रबंधन विभाग युवा आपदा मित्र, आपदा मित्र आदि को आपदा की दृष्टि से ट्रेंड करता है, उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम में फारेस्ट फायर, सांप काटने, वन्यजीवों के काटने का प्रशिक्षण का उल्लेख है। पर मानव- वन्यजीव संघर्ष में प्रशिक्षित लोगों का सूचना देने, विभागीय समन्वय करने से लेकर स्थिति संभालने में उपयोग हो पा रहा है? यह भी बड़ा सवाल है।

वन्यजीवों की दहशत बनी

पौड़ी जिले में वन्यजीवों के हमलों की घटनाओं को लेकर दहशत बनी हुई है। कमेड़ा ग्राम सभा की सावित्री ममगाईं बताती हैं कि पहले बंदर नहीं थी, अब इनकी संख्या बढ़ गई है। बचाव के लिए छत पर लोहे की जाली को लगाना पड़ा है। गुलदार का भी मूवमेंट लगातार बना हुआ है। खिर्सू के मदन रावत बताते हैं कि जब बर्फ पड़ी थी, तो घर के पास गुलदार सड़क पर चलता हुआ दिखा। भालू को लेकर भी चिंता है। बरसात के समय जब सब्जी को तैयार किया जाता है, तो उस समय भी भालू पहुंच जाता है। राजेश्वरी देवी बताती हैं कि वन्यजीवों से जुड़ी घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। बलवंत सिंह पंवार भी बताते हैं कि वन्यजीवों का भय बना हुआ है। लोगों का कहना है कि पहाड़ में अन्य जगह भी होने वाली घटनाओं से चिंता लोगों की बढ़ी हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसारभालू के हमले की पांच घटनाएं हुई। इसमें भालू ने दो लोगों को घायल किया, एक गाय को मारा और एक का दरवाजा तोड़ा था। वर्ष-2024 में तेंदुए के हमले में एक व्यक्ति की मृत्यु हुई थी।

क्या कहते हैं अधिकारी

प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा ने बताया कि प्रभागों का पुनर्गठन को लेकर कार्रवाई की जा रही है। साथ ही प्रभाग में कर्मियों की संख्या के साथ अन्य संसाधन को भी बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। प्रभागीय वनाधिकारी महातिम यादव बताते हैं कि मानव- वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए हर स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। संवेदनशील जगह पर टीमों को तैनात किया गया है। खतरनाक हो चुके वन्यजीवों को पकड़ने समेत अन्य कदम उठाए जाते हैं। जन जागरूकता भी की जा रही है। प्रभाग में एक रेस्क्यू या ट्रांजिट सेंटर बनाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। बच्चों की सुरक्षा के लिए एस्कोर्ट भी दिया जा रहा है।

बड़ा है गढ़वाल वन प्रभाग

सौ साल पुराने गढ़वाल वन प्रभाग का 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल है। इसकी सीमा धूमाकोट, कीर्ति नगर, लैंसडौन वन प्रभाग की सीमा तक फैली हुई है। वनाधिकारियों की अन्य क्षेत्रों में भी मानव वन्यजीव संघर्ष के दृष्टिगत कार्य करने की भी जिम्मेदारी होती है।

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