सोशल मीडिया कैसे रेगुलेट हो? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को थमा दिया ‘हथियार’

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट को लेकर बहुत ही सख्त रुख अपनाया है। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने अनियंत्रित सोशल मीडिया कंटेंट पर लगाम लगाने के लिए एससी/एसटी ऐक्ट की तरह कानून पर विचार करने को कहा है।

 सु्प्रीम कोर्ट ने कहा है कि सोशल मीडिया कंटेंट को रेगुलेट करने के लिए ऑटोनोमस बॉडी की जरूरत है। भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने माना है कि ‘सेल्फ-स्टाइल्ड’ बॉडी इन हालातों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं और बाहरी प्रभावों से मुक्त एक न्यूट्रल रेगुलेटर बॉडी की आवश्यकता है। सर्वोच्च अदालत ने तो केंद्र सरकार को इसके लिए एससी/एसटी ऐक्ट तक का उदाहरण दिया है।

अश्लील कंटेंट का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि क्या किसी व्यक्ति के आधार नंबर का इस्तेमाल सोशल मीडिया कंटेंट देखने से पहले उम्र सत्यापित करने के लिए किया जा सकता है, जिससे उसे ऐसे ऑनलाइन कंटेंट देखने का मौका मिल जाए, जो अश्लील हो सकता है। सर्वोच्च अदालत में उन यूट्यूबर्स की याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी, जिनमें इंडियाज गॉट लेटेंट शो के दौरान की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों के लिए उनके खिलाफ एफआईआर को चुनौती दी गई।

बेहत सख्त कानून की जरूर

इस दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने केंद्र से कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए सख्त कानून बनाने पर विचार करे, खासकर उन केस में जिनमें दिव्यांगों को अपमानित किया जाता है। सीजेआई ने मौखिक तौर पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘आप कुछ उसी तरह का क्यों नहीं सोचते हैं, जैसे कि एससी/एसटी ऐक्ट की तरह…जहां सजा मिलेगी, अगर आप उन्हें अपमानित (दिव्यांग को) करते हैं।’ सीजेआई की बातों पर तुषार मेहता ने कहा, ‘कुछ करना पड़ेगा। इसे यूजर जनरेटेड कंटेंट कहते हैं, उसमें कुछ कमी है…मैं अपना खुद का यूट्यूब चैनल बनाता हूं, मेरा अपना प्रोग्राम हो सकता है। मैं किसी भी कानून..नियम या कम से कम खुद से बनाए गए नियमों के कंट्रोल से बाहर हूं।’

‘ जिम्मेदार समाज बनाना जरूरी’

वहीं अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने बेंच को बताया कि केंद्र ने कुछ नई गाइडलाइंस प्रस्तावित की है। इसपर सीजेआई ने मौखिक तौर पर कहा, ‘पायलट बेसिस पर कुछ आने दें; और अगर इससे फ्री स्पीच और एक्सप्रेशन में रुकावट आती है, तो उस पर तब विचार किया जा सकता है। हमें एक जिम्मेदार समाज बनाने की आवश्यकता है और एक बार ऐसा हो जाने पर, अधिकतर समस्याओं का हल निकल जाएगा।

‘मौलिक अधिकार का बैलेंस जरूरी’

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि मौलिक अधिकार को बैलेंस करना होगा और ऐसी चीजों को मंजूरी नहीं दी जाएगी जो किसी का मुंह बंद करा दे। सीजेआई ने कहा,’अगर आप कोई उपाय लेकर आते हैं, तो हम रेगुलेटरी उपाय भी बताएंगे।’ सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘बोलने के अधिकार का सम्मान करना होगा। मान लीजिए कि कोई प्रोग्राम है और उसमें कुछ एडल्ट कंटेट है, तो पहले से कुछ चेतावनी दी जानी जरूरी है।’इसपर जस्टिस बागची ने भी मौखिक टिप्पणी में कहा, ‘बोलने के अधिकार की सुरक्षा करनी होगी’ लेकिन, ‘प्रिवेंटिव मेकेनिज्म’ होनी चाहिए। इस दौरान जस्टिस बागची ने कथित राष्ट्र-विरोधी कंटेंट का भी जिक्र किया और सवाल उठाया कि क्या इन्हें सेल्फ-रेगुलेशन से रोका जा सकता है।

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